Tuesday, December 6, 2011

जैसलमेर मे मरु मेला

जैसलमेर मे मरु मेला

मरू उत्सव शुरु होने से पहले अर्जुन सिंह भाटी ने जैसलमेर वासियों की खुशी दुगनी कर दी।(लाइव शो अराउंड द वर्ल्ड विथ अर्जुन सिंह भाटी( के  100 एपिसोड पुरे कर लिए है।  ये कार्यक्रम  अमेरिक  अंग्रेजी  में रेडियो पर लाइव आता है।
जैसलमेर मे मरु समारोह की धूम मची हुई है।16 से 18 फरवरी को आयोजित कार्यक्रमों की तैयारीव्यापक तौर पर की जा रही है। मारवाड़ी छवि के साथ-साथ मनोरंजन के लिए प्रसिद्ध है। मरू मेले में उँटो की प्रदर्शनी की जाती है। राजस्थान के रेगिस्तान के जहाज ऊँट  के साथ मिलकर करतब दिखाए जाते है।  यह पूनम सिंह स्टेडियम में किया जाता है। सबसे ज्यादा आकर्षक मुंछो की प्रदर्शनी होती है। यह मूंछ प्रतिस्पर्द्धा में विदेशी पर्यटक भी भाग लेते है। मारवाड़ी संस्कृति का रूप पुरे मेले पर झलकता है। मेले में देशी विदेशी पयर्टको को बढ़ावा देने के लिए अलग अलग तरह के कार्यक्रम किये जाते है।

 
 जैसलमेर राजस्थान का सबसे बड़ा(क्षेत्रफल) जिला है। जैसलमेर  का नामकरण भाटीजैसल राजा के नामपर रखा गया।भारतीय इतिहास में ये अपनी कला व् संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। भारत के पश्चिम भाग में है।  इसकी सीमा रेखा पाकिस्तान से मिलती है। जैसलमेर में रेत के टीले है इनको धौरे भी कहा जाता है। धौरे सम के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। इसका कारण भी है  की यह रेत कुछ दुरी पर देखने पर पानी लगती है।  सम के घर मिटटी के बने होते है।  यह मिटटी भी सम से 60 और जैसलमेर शहर से करीब 150 कि मी  दूर से लाई जाती है।  सम में घर  पर छत जंवासा  और आकड़ो के पत्तो से बनाई जाती है। ये घर शंकुनमा होते है।
संस्कृति तो यह के कण−कण में बसी हुई है।  राजस्थान कि संस्कृति एक तरह इसको ही मन जाता रहा है।कालबेलिया और घुमर यह के स्थानीयनृत्य है। नृत्य करते समय पहने जाने वाले वस्त्र आभूषण विशेष है। ये अपने आप में ही संस्कृति कि छवि को प्रदर्सित  करते  है। नायिका के बालो में 2  से 3 के रंग बिरंगे चुटीले होते है।नायिका कि ओढ़नी ढेड पाट साथ  में 7 से  8 मीटर का लंहगा होता है। आभूषण के नाम पुरे शरीर पर चांदी होती है।



प्राचीन महलो कि कारीगरी देखने में लुभावनी है।कारीगरों ने बहुत बारीकी से पत्थर पर नकाशी व् चित्रकारी के नमूने उखेरे है! ये चित्रकारी विदेशो तक प्रसिध्द है। सोनार किला जैसलमेर के शहर में है या, ये  कहे कि किले के चारो तरफ शहर बसा हुआ है। सोनार किला छोटी सी पहाड़ी पर बसा हुआ है।किले से पूरा जैसलमेर सुंदर ढंग से बसाया हुआ शहर लगता है।  सोनार किले के ठीक सामने गडिसर झील है। झील  किले के दरवाजा के सामने है। पटवा हवेली दो अलग -अलग समय कि बने हुई है । लेकिन देखने से कोई जज (निर्णय) नहीं कर सकता। किले और हवेली कि खास बात  बनाने में चुने और सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसमे पीले पत्थर  चोकोर व् आयत में कटा कर जमाया गया है। पीले होने के कारण यह सोनार किला कहा जाता है। सूर्यउदय  के समय किले कि छटा देखते ही बनती है।  किले के परकोट बहुत ही सुंदर दंग से पत्थरों को जोड़ा गया है।
जैसलमेर पयर्टको के मायने में बहुत महत्वपूर्ण जिला है। इसका मुख्य कारण यह किसंस्कृति के साथ साथ वातावरण भी है 20 से 30 प्रतिशत लोग यह पयर्टक पर निर्भर रहते है।  
गर्मी का मौसम बहुत निराशा भरा होता है लेकिन और सभी मौसम यह घुमने के अनुकूल है।   सर्दियों में यहा नाम मात्र कि ठंढ पडती है! ठंढे परदेसो के विदेशी यह ठंढ में घुमने आते है।  

आधुनिक बदलाव  के साथ साथ जैसलमेर इतना नहीं बदला है। यह शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ हाय भारतीय सेना का यहा जमावड़ा रहता है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान से जुडी सीमा कि सुरक्षा करना। सीमा पर सैनिको के लिए शहर से सामान ले जाया जाता है ! यह के लोग आपने आप को सुरक्षित महसूस करते है।  सुविधा के नाम पर यहा सेना का छोटा साहवाई अडडा भी है।  यातायात के लिए रेल व् बस भी है। चिकित्सा के क्षेत्र में यह बहुत पिछड़ा हुआ है ।  
इसी स्थति में संस्कृति के साथ−साथ आधुनिकता व् शिक्षा को यहा के लिय बदव लानाहोगा ।
स्तिथि बेहतर हो सकेगी। जैसलमेर को संचार कि सुविधा मिल चुकी है। लेकिन फिर भी वह पिछड़ा हुआ है।  
 












समाजिक, आर्थिक असमानता एंव भ्रष्टाचार

समाजिक, आर्थिक असमानता एंव भ्रष्टाचार

 आधुनिक जगत क महान विरोधभास यह है कि हर स्थान पर मनुष्य अपने को समानता के सिद्धान्त का समर्थक बताते है और हर स्थान पर वे अपने जीवन में तथा दुसरे के जीवन में असमानता की उपस्थिति का सामना करते है।-आन्द्रे बेतई

 समाज में किसी खास वर्ग को किसी वस्तु त्यौहार और विश्वमें अलग जाता है तो,असमानता श्रेणी में माना जाता है। समाज में असमानता अलग -अलग रुप में बांटी हुंई है। प्रथम प्राकृतिक या जैविक जैसे लिंग, स्वास्थ्य शारीरिक शक्ति, आयु, बुद्धि के स्तर पर देखते है। इन कमीयों के कारण, एक व्यक्ति अपने आपको समाज से अलग पाता हैं। मानसिक स्थिति ठिक नही होती हैं। यह एक पिछड़े वर्ग में ही गिनते है।
दुसरी स्थिति समाजिक ओर आर्थिक होती है जिसमें व्यक्ति के रहन-सहन समाजिक स्तर आदि चीजों को देखा जाता हैं। जिसमे अलग-अलग आर्थिक स्थिति के कारण माने जाते हैं।
भ्रष्टाचार  सस्ंकृति में वायरस की तरह फैलता जा रहा हैं। विदेशी फैसन के तौर पर अपना रहे हैं। जब सस्ंकृति का हनन होता हैं तो इसे सस्ंकृति भ्रष्टाचार  की श्रेणी में आता है। विकास के नाम पर फिजुल खार्ची में बढ़ोतरी कर रहे हैं।
हर कोई सबसे आगे रहना चहाता है। ये अच्छा भी है। जिसके लिए विश्वविधालय और स्कुलों में प्रष्न पत्र लीक किये जाते हैं। गैर सरकारी स्कुल सबसे आगे रहने के लिए जुगाड़ लगाते हैं। बच्चों को “शुरु में ही भ्रष्टाचार  में ढकेल रहे है।
भारत को आजाद हुए 63 साल हो गये है। लेकिन आज भी छुआछूत,जाति को देखा जाता है। इतने लम्बे समय में थोड़ा सा तो बदलाव आया है। लेकिन स्थिति बहुत ज्यादा नहीं सुधरी है। राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, ज्योति बा फुले ने समान में एकता व समानता लाने के लिए आगे आये। स्वंतत्रता की लड़ाई में महात्मा गांधी ने मूल मंत्र दिया की एकता में शक्ति हैं। एक जुट रहना होगा। अपने अतिंम समय में भी एकता का संदेश देते रहे।
समाजिक असमानता जाति के आधार पर कि जाती है। उच्च जाति को स्वर्ण निम्न जाति को अछूत की श्रेणी में रख कर देखा जाता है। इसी अछूत कहलाने वाले वर्ग के लिए भीमराव अम्बेडकर ने कार्य किया। वे स्वंय अछूत कहलाने वाली जाति से संबद्ध थे। सदियों तक वह व्यवस्था रुढ़ियों ओर परम्पराओं के नाम पर चलती रही है। निम्न जाति का शोषण किया जाता है। इसका परिणाम यह निकला कि समाज के समाज के कुछ वर्गों का अधिपत्य रहा, ओर कुछ को अधीनस्थता का जीवन जीना पड़ा। पिछड़े ओर शोषित वर्ग समाजिक सोपान में न केवल निचले स्तर पर चले गये।
भारत सरकार ने समाजिक जीवन में एक जैसा वर्ग स्थापित करने के लिए भारतिय सविधान में प्रावधान बनाये गये हैं। ये प्रावधान अलग-अलग स्तर पर दिखाई पड़ते है। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत देश सभी नागरिको को विधि की समानता का अधिकार प्रदान किया गया हैं। जिससे समाजिक स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होता दिखाई पड़ता है।
समाज में यदि समानता बनानी है। तो आम आदमी का  आर्थिक पक्ष मजबूत करना होगा। सरकारी योजनाओं से अछुते किसानों को उनका हक लेना होगा। एक मजबूत लोकतंत्र बनाने के लिए किसानो कि आय बढानी जरुरी है। आर्थिक पक्ष राजनीति को भी प्रभावित करता हैं।
बाहुबली, दंबग व्यक्तित्व वाला व्यक्ति नोटो से वोट खरीदता हैं। पं॰जवाहर लाल नेहरु ने ठिक ही लिखा है “भूखे व्यक्ति के लिए वोट का कोई महत्व नही है। आर्थिक असमानता सम्पतिवान वर्ग का वर्चस्व बढाती हैं।“शोषण और अन्याय की परिस्थितियाँ पैदा करती है। जो आक्रोष और अस्थिरता उत्पन्न करता हैं।”
गांधी जी चुनावओं के लिए जनता से चंदा लेने के भी खिलाफ थे। चुनाव निधि के लिए सरदार पटेल के धन संग्रह के प्रति नाराजगी प्रकट करते हुए उन्होने कहा था कि, कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए धन की जरुरत ही नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस के लोगों को अपनी सेवा और समर्पण भावना से जनता में ऐसा प्रभाव बनाना चाहिए कि मतदाता स्वंय उनका प्रचार करें। लेकिन कांग्रेस चुनाव निधि के लिए चंदा लेती रही। जिससे धनी लोगों से ली गयी थोक रकमें भी शामिल होती थी।
प्रश्न यह उठता है कि, विकसित विकासशील देशों मेंभ्रष्टाचार  के स्वरुप में यह अंतर क्यों हैं ? क्या यह संभव है कि, तीसरी और दुसरी दुनिया के देश भ्रष्टाचार  के मामले में कम से कम विकसित देशों के समान निचले स्तर काभ्रष्टाचार  समाप्त कर सकें ?
राजनीतिक सत्ता पुलिस का अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हैं और कई बार सत्ताच्युत नेताओं तक को पुलिस को रगड़ा लग जाता है। पुलिस भ्रष्टाचार  जाति धर्म उम्र लिंग पेशा आदि कटघरों को नहीं मानता।
विकीलीक्स पर लगातारभ्रष्टाचार   का खुलासा हो रहा है। पक्ष और विपक्ष एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे है। इसको समाप्त करने के लिए एक पहल पश्चिम बंगाल में बागडा़ सीट पर उपेन बिस्वास सीबीआई के पूर्व अतिरिक्त महानिदेषक चुनाव लड़ रहे है। बिस्वास चारा घोटले को सामने लेकर आये। बिस्वास की खास बात की चुनाव खर्च बागड़ा के लोग उठा रहे है। सारा चुनाव खर्च वेबसाईट पर डालेगें। बिस्वास मानना है की इस तरहभ्रष्टाचार  का खत्म किया जा सकता हैं। यदि सभी नेता अपना चुनावी खर्च का खुलास कर दें तो, भ्रष्टाचार  खत्म हो जायेगा। कोई कमेटि बनने कि कोई जरुरत नहीं पडेगा।
तमिलनाडु में आईएएस अधिकारी ’यू सागायम’ ने वेब साईट पर अपनी संपत्ति घोषित करके राज्य के आईएएस अफसर के तौर पर इतिहास बनाया है।
1963 के अंत में तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने घोशणा की उच्च पदों पर भ्रष्टाचार  को खत्म करने के लिए वे मजबूत कदम उठायेगें और अगर वे इसमें कामयाब नही हुए तो गृह मंत्री के पद से त्यागपत्र दे देगें।
1986 में स्वीडन की ए‐ बी‐बोफोर्स कंपनी से155 तोपें खरीदने का सौदा तय हुआ। स्वीडन कंपनी ने इस आदेश को पाने के लिए 64 करोड़ रुपयों की दलाली दी। इस कैस में निचली अदालत के एक जज ने बोफोर्स मामले को बंद करते समय सीबीआई को याद दिलाया की मामला 64 करोड़ रुपयों का था और इस कैस पर 250 करोड़ रुपयों खर्च कर दिये गये हैं।
आरुषि हेमराज हत्या कांड, कॉमनवेल्थ गेम्स, दूरसंचार विभाग2-जी स्पेक्ट्रम जैसे बहुत कैस आज भी अदालतों में, और कमेटीयों में चल रहे है। जाने कब तक चलते रहगें ? आम आदमी से लूटा हुआ पैसा कब तक विदेशों में जमा रहेगां ?

क्या फेसबुक पर भी सरकार हावी ?

क्या फेसबुक पर भी सरकार हावी ?

"अब क्या फेसबुक पर भी सरकार हावी हो जाएगी ?  सरकार कुछ तस्वीरों के नाम पर बची कुची आवाजों को भी बंद कर देनी चाहती है ?"
युवाको अपनी बात रखने की आजादी शायद अब न रहे। टेलिकॉम मिनिस्टर कपिल सिब्बल ने इंटरनेट कंपनियों से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोहम्मद पैगंबर से जुड़ी कथित अपमानजनक, गलत और भड़काने वाली सामग्रियों को हटाने के लिए कहा है। क्या अब गूगल ,फेसबुक ,मेल, टूयूटर सरकार की मर्जी से चलेगे ? कपिल सिब्बल का माना है की ये देश में अराजकता पैदा कर रहे है।

शायद अब कपिल जी को अपने कार्टूनों का पता चल गया है। इस लिए वो फेसबुक पर भी सेंसर लगवाना चाहते है लेकिन फेसबुक पर तो पहले से ही इसके लिए कार्य किया जा रहा है। एक और सेंसर की आवश्कता क्या है ? लगातार देश में हो रहे घोटालो को उजागर करने में फेसबुक की अहम भूमिका रही है ये भूमिका चाहे प्रत्यक्ष रूप से न रही हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ये सभी खबरों को जनता तक आसानी से पहुंचा रहा है ।

मिडिया को सरकार अपने अनुरूप भोकने वाला बना लिया है। इस लिए मिडिया एक पक्ष की खबरे ही दिखता है। राजनीतिक पार्टिया खबरे अपने अनुसार चलवाती है। मिडिया में सेंसर का प्रवधान है इस लिए कुछ खबरों को दिखाया ही नहीं जाता है टी वी और अखबारों में जनता की आवाज़ नहीं पैसा बोलता है । जन्हा से पैसा मिलेगा वही खबर चलेगी ।

फेसबुक पर भड़काऊ तस्वीरें दिखाईं। सिब्बल ने पूछा कि इन तस्वीरों के बारे में उनकी क्या राय है? सिब्बल ने उनसे कहा कि भारत सरकार सेंसरशिप में विश्वास नहीं करती है लेकिन विभिन्न समुदायों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले और अन्य संवेदनशील मसलों को ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। चूंकि ये कंपनियां इन साइट्स को चलाती हैं इसलिए उन्हें इसे नियमित करना होगा।
इससे पहले 1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने अखबार पे प्रतिबंध लगाया था। उस समय भी मिडिया की इतनी पहुँच जनता तक नहीं थी और, सोसल साइट्स का तो नाम ओ निशान नहीं था फिर, भी इंदिरा गांधी ने जनता की आवाज़ को दबाने का भरसक प्रयास किया था ।
कंपनियों की दलील है कि इनमें से ज्यादातर कंटेंट यूजर्स की ओर से ही आता है इसलिए इन पर नियंत्रण रखना मुश्किल है और ऐसे कंटेंट के लिए कंपनियों के प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। हां, किसी खास मामले में अगर कोई शिकायत आती है तो वे जरूर देखेंगे लेकिन आम तौर पर इन्हें नियंत्रित करने से इस माध्यम का इंटरऐक्टिव चरित्र ही नष्ट हो जाएगा।
कपिल सिब्बल तस्वीरों से नहीं, जनता के आन्दोलन से डर रहे है। जनता फेसबुक पर एक जुट हो रही है । आपस में संवाद बनती है और एक दुसरे के पक्ष को जानने की कोशिश करती है। युवाओ में फेसबुक का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है और आज का युवा जानना चाहता है की देश में क्या हो रहा है उसके साथी किस विषय पर क्या सोचते है?

यदि बात केवल कुछ तस्वीरों को लेकर है तो ठीक है लेकिन जब ये इससे ज्यादा प्रतिबंद करते है तो ये जनतंत्र की आवाज़ पर हमला है ।

जनता कुछ तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करती है तो ये उसका विरोध जताने का एक तरीका है और तस्वीरों के नाम पर यदि ये विचारो पर रोक लगते है तो ये ठीक नहीं है
कपिल सिब्बल जो इन जैसी तस्वीरों के कारण फेसबुक पर प्रतिबन्ध की बाते करते है----




 






(नोट -- ये सभी तस्वीरे गूगल और फेसबुक से ली गई है ) ये जनता है किसी को नहीं छोडती  है